गरियाबंद। छत्तीसगढ़ शासन वन विभाग द्वारा 64 सहायक वन मंडलाधिकारियों (SDO) की तबादला सूची जारी की गई है। इस सूची में गरियाबंद जिले को लेकर कई सवाल खड़े हो रहे हैं। चर्चा है कि कुछ अधिकारी पिछले 10-15 सालों से गरियाबंद जिले के अंदर ही एक रेंज से दूसरे रेंज में घूम रहे हैं, जिले से बाहर नहीं जा रहे।
सबसे चर्चित नाम – मनोज चंद्राकर
सूची में एक नाम गरियाबंद वन मंडल के देवभोग अनुभाग के उप वनमंडलाधिकारी मनोज चंद्राकर का है।
स्थानीय जानकारी के अनुसार,चंद्राकर लगभग 8-10 साल पहले गरियाबंद वन परिक्षेत्र में वन परिक्षेत्र अधिकारी (रेंजर) के रूप में पदस्थ थे। इसी पदस्थापना के दौरान उनकी पदोन्नति उप वनमंडलाधिकारी के रूप में हुई और वे गरियाबंद में ही SDO के रूप में कार्य करते रहे। इसके बाद उनका तबादला गरियाबंद जिले के ही दूसरे अनुभाग देवभोग में कर दिया गया।
अब साय सरकार द्वारा जारी नई तबादला सूची में उनका तबादला फिर से गरियाबंद जिले के अंदर ही राजिम अनुभाग में किया गया है।
इसको लेकर वन विभाग के गलियारों और स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि लगभग 10-15 साल से एक ही जिले में पदस्थ रहना सामान्य प्रक्रिया से अलग है। सूत्रों का आरोप है कि विभागीय कार्यों और सेटिंग के चलते उनका तबादला जिले से बाहर नहीं हो रहा है। यह आरोप जांच का विषय है।
दूसरा पहलू – जय-वीरू की जोड़ी की वापसी
तबादला आदेश का दूसरा चर्चित नाम राजेंद्र कुमार सोरी का है, जिन्हें देवभोग अनुभाग में पदस्थ किया गया है।
बताया जाता है कि कुछ साल पहले ही देवभोग अनुभाग से राजेन्द्र सोरी का तबादला बिलासपुर (कानन पेंडारी) किया गया था। अब उनकी फिर से गरियाबंद जिले में वापसी हो गई है।
स्थानीय चर्चा के अनुसार, राजेंद्र सोरी और मनोज चंद्राकर की जोड़ी को वन विभाग में “जय-वीरू” की जोड़ी कहा जाता है। दोनों ने रेंजर के रूप में जिले में अपनी सेवा शुरू की और बाद में एसडीओ पदोन्नत किये गये।
सूत्रों के हवाले से यह भी कहा जा रहा है कि इनके कार्यकाल में हुये कुछ कार्यों को लेकर पहले शिकायतें हुई थीं, जिनमें पंचायत चुनाव के दौरान चुनाव आयोग में शिकायत और फर्जी बिलिंग के आरोप शामिल हैं। सूत्रों के अनुसार एक मामले में आर्थिक अन्वेषण की चर्चा भी है, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
मांग – सूक्ष्म जांच की जरूरत
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि सरकार इन अधिकारियों के गरियाबंद जिले में लंबे कार्यकाल और इस दौरान हुये विभागीय कार्यों की निष्पक्ष और सूक्ष्म जांच कराये, तो वास्तविक स्थिति सामने आ सकती है।
फिलहाल वन विभाग की इस तबादला सूची ने गरियाबंद में नई बहस छेड़ दी है।
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