गरियाबंद / छुरा । प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) देश के सबसे गरीब, बेघर और कच्चे मकानों में रहने वाले परिवारों के लिये एक पक्की छत का भरोसा लेकर आई थी। लेकिन छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले के छुरा जनपद पंचायत क्षेत्र में केंद्र सरकार की इस महत्वपूर्ण योजना विवादों में घिरती जा रही है। छुरा जनपद अंतर्गत ग्राम – रसेला, सोरिद, हीराबतर और रुवाड जैसे मामलों के बाद अब ग्राम पंचायत घटकर्रा के आश्रित ग्राम नांगझर से सामने आया नया प्रकरण यह संकेत दे रहा है कि कथित अनियमितताओं की श्रृंखला अब भी जारी है।
सरकारी सेवा में होने के बावजूद मिला प्रधानमंत्री आवास
ताजा मामला नांगझर निवासी उमेश साहु पिता समारू साहु से जुड़ा है, जो वर्ष 2017 से एसटीएफ (स्पेशल टास्क फोर्स) में पदस्थ बताये जा रहे हैं।उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार वर्ष 2024–25 में उनके नाम प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मकान स्वीकृत किया गया। रिकॉर्ड में दर्शाया गया है, जिसकी पहली किस्त 8 सितंबर 2024 को और अंतिम किस्त 28 फरवरी 2025 को जारी हुई। कुल 1 लाख 20 हजार रुपये की राशि का पूरा भुगतान हो चुका है और आवास को “पूर्ण” दर्शाया गया है।
प्रधानमंत्री आवास योजना के दिशा-निर्देश स्पष्ट करते हैं कि नियमित सरकारी सेवा में कार्यरत व्यक्ति इस योजना के पात्र नहीं होते। इसके बावजूद किसी सरकारी कर्मचारी के नाम आवास स्वीकृत होना, निर्माण पूरा होना और पूरी राशि निकाला जाना पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
ग्रामीणों ने की पुष्टि –
गांव के कई ग्रामीणों ने नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर बताया कि—उमेश पिता समारु राम साहु एसटीएफ में शासकीय कर्मचारी हैं। इसके बावजूद उनके नाम से प्रधानमंत्री आवास स्वीकृत हुआ और मकान का निर्माण भी कराया गया, ग्रामीणों का कहना है कि गांव में यह बात सभी जानते हैं कि उमेश साहु सरकारी सेवा में हैं, इसके बावजूद आवास योजना में उनका नाम जुड़ना समझ से परे है।
जिम्मेदारी किसकी ? पंचायत स्तर पर उलझे जवाब
मामले में जब ग्राम पंचायत घटकर्रा से जानकारी ली गई तो वर्तमान सचिव कृष्णा कुमार साहु ने कहा कि यह मामला उनके कार्यभार संभालने से पहले का है और इसकी जानकारी पूर्व सचिव या तत्कालीन सरपंच ही दे सकते हैं।
इन बयानों से स्पष्ट है कि पंचायत स्तर पर ही जवाबदेही तय नहीं हो पा रही है। हर कोई फाइलें, तारीखें और पुराने कार्यकाल का हवाला देकर जिम्मेदारी से बचता नजर आ रहा है।
रसेला से शुरू हुई थी परतें -अब नांगझर तक पहुंचा मामला
छुरा जनपद पंचायत में प्रधानमंत्री आवास योजना को लेकर यह पहला मामला नहीं है।इससे पहले रसेला में नगर क्षेत्र के व्यक्ति के नाम आवास की स्वीकृति, सोरिद में सरकारी सेवा से जुड़े परिवार के नाम मकान,हिराबतर में अधूरे निर्माण पर भुगतान, और रुवाड में बिना वास्तविक मकान बने राशि निकासी जैसे प्रकरण सामने आ चुके हैं।
इन मामलों को लेकर ग्रामीणों ने जनदर्शन और पंचायत स्तर पर शिकायतें कीं, मीडिया में खबरें प्रकाशित हुईं, लेकिन अब तक किसी बड़ी प्रशासनिक कार्रवाई की ठोस जानकारी सार्वजनिक नहीं हो पाई।
गरीबों के हक पर सीधा असर –
प्रधानमंत्री आवास योजना केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि उन हजारों गरीब परिवारों की उम्मीद है, जो आज भी जर्जर झोपड़ियों और कच्चे मकानों में जीवन बिता रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि जब सरकारी कर्मचारी या सक्षम लोग इस योजना का लाभ लेते दिखते हैं, तो यह सीधे-सीधे वास्तविक जरूरतमंदों के अधिकार पर चोट है।
नांगझर मामला बना पूरी व्यवस्था का आईना नांगझर का यह ताजा प्रकरण अब सिर्फ एक गांव तक सीमित नहीं रह गया है।यह मामला पूरे छुरा जनपद पंचायत की निगरानी प्रणाली, स्वीकृति प्रक्रिया और भुगतान तंत्र पर सवाल बनकर खड़ा हो गया है। स्थानीय लोगों की मांग है कि छुरा जनपद क्षेत्र में पिछले वर्षों में स्वीकृत सभी प्रधानमंत्री आवासों की ब्लॉक और जिला स्तर पर संयुक्त जांच कराई जाये, पात्रता सूची सार्वजनिक की जाये और जिन अधिकारियों-कर्मचारियों की भूमिका सामने आती है,उनके खिलाफ नियमों के तहत कार्रवाई हो।
साख और उद्देश्य दोनों दांव पर –
प्रधानमंत्री आवास योजना की साख तभी बचाई जा सकती है, जब समय रहते ठोस कदम उठाये जाये । अन्यथा यह योजना भी उन सरकारी कार्यक्रमों की सूची में शामिल हो जायेगी, जिनका नाम तो गरीबों के लिये होता है, लेकिन लाभ अपात्र और सम्पन्न उठा लेते हैं।







