जामड़ी पाट को लेकर बढ़ा असंतोष, आदिवासी समाज ने प्रशासन पर लगाये गंभीर आरोप

समाज का दावा है कि जामड़ी पाट उनके पूर्वजों की आस्था और परंपराओं का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है, जहां लंबे समय से धार्मिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियां आयोजित होती रही हैं। उनका आरोप है कि..

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साजू चाको,बालोद। जिले के चर्चित जामड़ी पाट विवाद ने एक बार फिर तूल पकड़ लिया है। आदिवासी समाज ने प्रशासन पर वादाखिलाफी, अवैध निर्माण और धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान की अनदेखी के आरोप लगाये हैं। समाज का कहना है कि वर्षों से चली आ रही उनकी मांगों पर अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है।

बालोद जिले के जामड़ी पाट से जुड़ा विवाद एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है। आदिवासी समाज के प्रतिनिधियों और ग्रामीणों ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुये आरोप लगाया है कि उनकी धार्मिक आस्था, पारंपरिक देवस्थलों और सांस्कृतिक विरासत को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा है।

समाज के प्रदेश अध्यक्ष के अनुसार, 30 तारीख को प्रस्तावित जलसा कार्यक्रम एवं जामड़ी पाट से जुड़े विभिन्न मुद्दों को लेकर प्रशासन और कलेक्टर के प्रतिनिधियों के साथ चर्चा हुई थी। बैठक के बाद समाज के प्रतिनिधि प्रशासन को स्थल की वास्तविक स्थिति दिखाने और अपने पारंपरिक देवस्थल का निरीक्षण कराने जाना चाहते थे, लेकिन उन्हें रास्ते में ही पुलिस बल द्वारा रोक दिया गया।

समाज का दावा है कि जामड़ी पाट उनके पूर्वजों की आस्था और परंपराओं का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है, जहां लंबे समय से धार्मिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियां आयोजित होती रही हैं। उनका आरोप है कि क्षेत्र के मूल स्वरूप में परिवर्तन किया जा रहा है तथा पारंपरिक पहचान को प्रभावित करने वाले कदम उठाये जा रहे हैं।

धार्मिक स्थलों के नाम और स्वरूप में बदलाव की शिकायतों को लेकर भी समाज में नाराजगी व्याप्त है।आदिवासी समाज ने क्षेत्र में कथित अवैध निर्माण और पेड़ कटाई के मामलों पर भी चिंता जताई है। उनका कहना है कि इन मामलों में जांच और कार्रवाई की बातें सामने आने के बावजूद निर्माण गतिविधियों पर प्रभावी रोक नहीं लगाई जा सकी है।

समाज के प्रतिनिधियों का कहना है कि प्रशासन द्वारा समय-समय पर समाधान और कार्रवाई का आश्वासन दिया गया, लेकिन जमीनी स्तर पर अपेक्षित परिणाम दिखाई नहीं दिये। इससे लोगों का भरोसा कमजोर हुआ है और समाज के भीतर असंतोष लगातार बढ़ रहा है।

समाज के नेताओं ने स्पष्ट किया कि उनका किसी धर्म, संत या समुदाय से कोई विरोध नहीं है। उनका उद्देश्य केवल अपने पारंपरिक देवस्थलों, धार्मिक मान्यताओं और सांस्कृतिक एवम प्राकृतिक धरोहर की रक्षा करना है। उनका मानना है कि किसी भी विकास कार्य या निर्माण गतिविधि से पहले स्थानीय लोगों की भावनाओं तथा क्षेत्र के ऐतिहासिक महत्व का सम्मान किया जाना चाहिए।

आदिवासी समाज ने जिला प्रशासन और राज्य सरकार से पूरे मामले की निष्पक्ष जांच, पारदर्शी कार्रवाई और स्थायी समाधान की मांग की है। उनका कहना है कि यदि समय रहते विवाद का न्यायपूर्ण समाधान नहीं किया गया तो क्षेत्र में सामाजिक असंतोष और बढ़ सकता है।

समाज ने उम्मीद जताई है कि प्रशासन संवाद, संवैधानिक प्रक्रिया और सभी पक्षों की सहभागिता के माध्यम से इस लंबे समय से चले आ रहे विवाद का समाधान निकालने की दिशा में ठोस कदम उठायेगा।

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