कहाँ तक पहुंचेगा यूएसटीआर और ग्रामीणों का संघर्ष

उप निदेशक स्पष्ट चेतावनी देते हुये कहते हैं कि अपने कहे अनुसार 2 दिवस में 162 आरोपियों ने सरेंडर नही किया तो दल-बल के साथ गिरफ्तारी की प्रक्रिया फिर शुरू होगी..

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अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस पर विशेष लेख

किरीट ठक्कर

गरियाबंद और धमतरी जिले में स्थापित उदंति-सीतानदी टाईगर रिजर्व विभाग ईन दिनों विवादों में है, हालांकि पहले भी कई मामले सामने आ चुके हैं, किन्तु हालिया समय में इस विभाग और अभ्यारण क्षेत्र में रहने वाले ग्रामवासियों- वनवासियों के बीच स्थिति तनावपूर्ण होती जा रही है।

एक तरफ वन सरंक्षण और वन्य जीव सुरक्षा का कानूनन दायित्व है, तो दूसरी तरफ इस रिजर्व क्षेत्र में दशकों से बसे आदिवासियों ग्रामवासियों की मूलभूत मांगे हैं। जिसे लेकर टकराव- विवाद और धरना प्रदर्शन समय समय दिखाई देता रहता है।

1974 में सीतानदी अभ्यारण और 1983 में उदंति अभ्यारण की स्थापना की गई थी। संभवतः 2009 में दोनों अभ्यारण क्षेत्रों को मिलाकर टाईगर रिजर्व घोषित किया गया।

कुल 1842 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में विस्तृत इस अभ्यारण का उद्देश्य बाघ तेंदुए गौर जैसे वन्य जीवों का संरक्षण और छत्तीसगढ़ के राजकीय पशु वनभैंसे का संवर्धन करना और वन की रक्षा करना है, किन्तु स्थापना के साथ ही इसके उद्देश्यों, साथ ही विभाग की कार्यशैली को लेकर सवालिया निशान लगते रहे हैं ।

इस अभ्यारण के नजदीकी गांव- कस्बे में रहने वाले कुछ नागरिकों का दावा है कि इस अभ्यारण में कोई बाघ ही नहीं है। अभ्यारण निवासी बहुत से ग्रामीण भी बाघ की उपस्थिति से इंकार करते हैं। कहते हैं बरसों बरस से यहां हमने कोई बाघ नही देखा। कई बार खुद वरुण जैन कहते हैं कि इस अभ्यारण में बाघों का केवल आना-जाना है। कुल मिलाकर ये रिजर्व क्षेत्र बाघों का स्थायी निवास नही,अपितु प्रवास क्षेत्र या टाईगर कॉरिडोर कहा जा सकता है।

पिछले कुछ वर्षों के दरम्यान इस अभ्यारण में संरक्षण संवर्धन के नाम, बाड़े में बंद वनभैंसो के नस्लीय होने का संदेह ना सिर्फ स्थानीय नागरिक करते रहे हैं,बल्कि प्रख्यात समाजसेवी व वन्यजीव प्रेमी नितिन संघवी भी वनभैंसो की नस्ल के डीएनए जांच की मांग करते हैं।

यूएसटीआर की वनभैंसा वंशावली – इनमें से नर छोटू ही जीवित है।

वर्तमान 2022 में यूएसटीआर के युवा डिप्टी डायरेक्टर वरुण जैन की पद स्थापना के बाद, इस अभ्यारण क्षेत्र में वनों तथा वन्यजीवों के संरक्षण संवर्धन को एक नई दिशा मिली है। इस जंगल में पक्षियों का कलरव तथा वन्यजीवों का स्वछंद विचरण बढ़ा है। मानव-वन्यजीव संघर्ष में कमी आई है। युवा अधिकारी ने इसके लिये बहुत सी नई टेक्नोलॉजी को अपनाया है। सेटेलाइट इमेजरी,ड्रोन और ट्रेप कैमरों की मदद ली जा रही है।

वरुण जैन की विशेष उपलब्धि एलिफेंट-एप्प का निर्माण किया जाना है, उनका दावा है कि इससे हाथी-मानव द्वंद में कमी आयेगी। इस सबके बावजूद डिप्टी डायरेक्टर वरुण जैन के सामने बहुत सी चुनौतियां भी है और आरोप भी है। आरोप है कि अपने मातहतों के गलत कार्यों को वे नजर अंदाज करने का प्रयास करते हैं। हालांकि कुछ समय पहले एक विभागीय एसडीओ से टकराव की बातें भी सामने आयी थी।

स्थानीय कुछ लोग व्यंग्यात्मक लहजे में कहते हैं कि इनके सेटेलाइट और ड्रोन कैमरे सिर्फ गरीब आदिवासी ग्रामीणों के घरों की तस्वीर निकालते हैं, उनके घरों के भीतर से भालू के दांत नाखून निकाल लाते हैं, तो जरा उन विभागीय अधिकारियों कर्मचारियों की 15 साल पुरानी स्थितियों परिस्थितियों और आज के रहन सहन मकान जमीन जायदाद तिजोरी बैंक बैलेंस की तस्वीरें भी इन कैमरों में कैद की जानी चाहिये,जो यहां पदस्थ रहते आये हैं।

हालिया सिहावा थाना अंतर्गत जैतपुरी गांव के अतिक्रमण के मामले में 100 -150 से अधिक ग्रामीणों ने डीएफओ वरुण जैन सहित वन कर्मियों पर हमला कर दिया था। वरुण जैन अपने मातहतों के साथ वहां उन 166 अतिक्रमणकारियों की गिरफ्तारी के लिये गये थे, जिन पर एक लाख वृक्ष काटने और 265 एकड़ वनभूमि में अतिक्रमण के आरोप है।

उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व के रिमोट सेंसिंग पोर्टल की ओर से जारी 20 साल के सैटेलाइट डेटा और तस्वीरों के विस्तृत विश्लेषण के बाद अभ्यारण क्षेत्र में अतिक्रमण के दावे किये जा रहे है। सैटेलाइट तस्वीरें बताती है कि 2013 तक जैतपुरी का पूरा इलाका वनाच्छादित था। 2006, 2008 और 2010 से यहां अवैध कटाई और अतिक्रमण शुरू हुआ।

ग्रामीणों (विशेषकर जैतपुरी क्षेत्र के निवासियों) का दावा है कि वे पीढ़ियों से इस पुश्तेनी जमीन पर खेती करते आ रहे हैं। हाल ही में ग्रामीणों ने वन विभाग की टीम पर बर्बरतापूर्वक मारपीट करने का आरोप लगाते हुये धमतरी कलेक्टर और एसपी को ज्ञापन सौंपा है। इस मामले में धमतरी और सिहावा विधायक साथ ही कुछ स्थानीय जनप्रतिनिधि ग्रामीणों के साथ है।

यहाँ एक महत्वपूर्ण जनपक्षीय प्रश्न उठता है कि यदि इतने बड़े स्तर पर अतिक्रमण और वृक्ष कटाई हुई, तो विभाग वर्षों तक मौन क्यों रहा ? क्या सैकड़ों एकड़ भूमि पर अतिक्रमण रातों-रात हो गया ? यदि पूर्व में वन अपराध दर्ज हुये थे, तो उनके बाद प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

कुछ विश्लेषणों के अनुसार, लंबे समय तक यह क्षेत्र नक्सल प्रभाव से प्रभावित रहा, जिसके कारण प्रशासनिक और वन विभागीय कार्रवाई सीमित रही। अब परिस्थितियाँ बदलने के बाद उन्हीं ग्रामीणों को आरोपी के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। ऐसे में यह सवाल भी उठता है कि क्या कानून का क्रियान्वयन केवल परिस्थितियों की अनुकूलता पर निर्भर होना चाहिये ?
यूएसटीआर की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति में बताया गया कि जैतपुरी के 166 आरोपियों के खिलाफ 2008, 2011 और 2015 में भी वन अपराध प्रकरण दर्ज किये गये थे। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि उन मामलों में आगे क्या कार्रवाई हुई।

एक और संघर्ष : ओडिसा के बुजुर्ग से मारपीट का आरोप

अभी पिछले ही दिनों उदंती सीतानदी टाइगर रिजर्व के कुल्हाड़ीघाट वन परिक्षेत्र में वन विभाग मैनपुर की एंटी पोचिंग टीम पर ओडिशा के 65 वर्षीय बुजुर्ग जलंधर यादव से मारपीट और दुर्व्यवहार का गंभीर मामला सामने आया है । मामले को लेकर ओडिशा के नुआपाड़ा जिले के ग्रामीणों ने मैनपुर पहुंचकर वन विभाग कार्यालय का घेराव किया और दोषी कर्मचारियों पर कार्रवाई की मांग की। उन्होंने बताया कि घटना की एफआईआर ओडिसा के बोडेन थाने में की गई है। वन विभाग की इस तरह की कार्यवाही का विरोध स्थानीय नागरिकों तथा कुछ जनप्रतिनिधियों ने भी किया है।

ये घटना लगातार मीडिया की सुर्खियों में थी, कि इसी दरमियान डीएफओ दल-बल सहित जैतपुरी गांव 166 आरोपियों की गिरफ्तारी के नाम पहुंच गये। सवाल है कि क्या वृद्ध जलंधर के मामले को डाइवर्ट करने का विचार था। इतनी अधिक संख्या में गिरफ्तारी के लिये आपके पास कितना दल-बल था ? पुलिस को सूचना पहले दी गई या बाद में ?

और अब –
इन घटनाओं और सवालों के बीच यूएसटीआर के उप निदेशक द्वारा 20 मई को जारी की गई प्रेस विज्ञप्ति भी काफी रोचक है, उन्होंने इस विज्ञप्ति में बताया कि जैतपुरी के आरोपियों को गिरफ्तार करने निहत्थे गयी,टाइगर रिज़र्व की टीम पर ग्रामीण मारपीट के झूठे आरोप लगा रहे है।
शुरू से लेकर अंत तक की कारवाई की विडियो फुटेज वन विभाग के पास पहले से मौजूद है । वन कर्मियों से मारपीट, शासकीय वाहन की चाबी छीनना, गिरफ्त में आये आरोपियों को छुडाना सब कैमेरो में कैद है।

उन्होंने अतिक्रमणकारियों को दो टूक में जवाब देते लिखा है कि- महानदी को बचाना टाइगर रिज़र्व की जिम्मेदारी है। उन्होंने ये भी बताया कि अपनी जान पर खेलकर 3 वर्ष पूर्व 2023 में घोर नक्सली क्षेत्रो में बिना पुलिस बल के 600 हेक्टेयर अतिक्रमण हम हटा चुके है,अतः कोई ग़लतफ़हमी न पाले।

उन्होंने माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा उदंती अभ्यारण्य वाइल्डलाइफ कॉरिडोर को सुरक्षित रखने के कड़े निर्देशों का हवाला भी दिया है। बताया गया कि कड़े संघर्ष के बाद जैतपुरी में गिरफ्तार 4 आरोपी को 10 दिन की रिमांड पर जेल दाखिल कराया गया है।

उप निदेशक स्पष्ट चेतावनी देते हुये कहते हैं कि –
अपने कहे अनुसार 2 दिवस में 162 आरोपियों ने सरेंडर नही किया तो दल-बल के साथ गिरफ्तारी की प्रक्रिया फिर शुरू होगी।

एक ओर वन और वन्यजीव संरक्षण का प्रश्न है, तो दूसरी ओर वर्षों से जंगल और जमीन पर निर्भर समुदायों का जीवन और अस्तित्व। ऐसे में टकराव की बजाय संवाद, सामंजस्य और संवेदनशील समाधान की आवश्यकता अधिक महसूस होती है। उम्मीद की जानी चाहिये कि स्थानीय जनप्रतिनिधि, वरिष्ठ नागरिक, ग्रामीण समुदाय और यूएसटीआर प्रशासन आपसी बातचीत के माध्यम से किसी व्यावहारिक समाधान की दिशा में आगे बढ़ेंगे।
लेख के अंत में कवि बलराम कांवट की ये पंक्तियाँ शायद इस पूरे विमर्श की मानवीय संवेदना को सबसे बेहतर ढंग से व्यक्त करती है –

आकाश में फैलते धुएँ के नाम पर, मैं उस बुढ़िया से नहीं लड़ सकता..
जो काँटों और चप्पलों की लड़ाई लड़कर लाती है
बीहड़ से ईंधन
और अपने लिये दो रोटियाँ सेंकती है।

पशु अधिकारों के बारे में
कैसे कहूँ मैं उस गड़रिये से कि
आज़ाद करो अपने रेवड़
और बंद करो
जंगल-जंगल चलना-विचरना
जिसका इस संसार में कोई नहीं
सिवाय इन भेड़ों और बकरियों के..

मैं उस मछुआरे को नहीं पढ़ा सकता
जीव-हत्या का पाठ
जिसके पास केवल यह नौका है
और केवल जल

मैं खेत पर जाते किसान का बैल नहीं छीन सकता!
मैं जंगल बचाने के लिये नहीं रोक सकता
किसी लकड़हारे की साइकिल

मैं जैव-विविधता की चिंता में
फूल बेचने जाती स्त्रियों का बाज़ार बंद नहीं करवा सकता।

मैं उस मदारी का खेल कैसे रोकूँ
जो ख़ुद ही दुनिया के खेल से बाहर बैठा है
मैं किसी भील से नहीं कहूँगा
कि जंगल जलाकर मत उगाओ अन्न..

बहुत बढ़िया है वीगनवाद
लेकिन इसके लिये
मैं एक दलित बच्ची के हाथ से नहीं छीनूँगा
दूध की बोतल
जिसे इतिहास में पहली बार मिला है
ऐसा दुर्लभ क्षण..

यहाँ बहुत ज़्यादा लोग हैं
जो प्रकृति की इन्ही नन्हीं कुतरनों के सहारे टिके हुये हैं
अब भी पृथ्वी पर
लेकिन इन बेर कुतरते पक्षियों को,मैं उनकी शाख़ से नहीं उड़ा सकता..


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