गरियाबंद। राष्ट्रीय विशेष पिछड़ी जनजाति कमार समाज भारत के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनसिंग सोरी ने वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री केदार कश्यप के नाम ज्ञापन सौंपकर उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व क्षेत्र में कमार जनजाति के लोगों के साथ कथित अन्याय और उत्पीड़न की शिकायत की है। ज्ञापन की प्रतिलिपि कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक, एसडीएम मैनपुर तथा थाना प्रभारी मैनपुर को भी भेजी गई है।
ज्ञापन में आरोप लगाया गया है कि उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व के अधिकारियों एवं कुछ वन कर्मचारियों द्वारा स्थानीय कमार जनजाति के गरीब और निर्दोष लोगों पर फर्जी वन प्रकरण दर्ज किये जा रहे हैं। समाज का दावा है कि बिना पर्याप्त जांच और प्रमाण के ग्रामीणों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है, जिससे क्षेत्र में भय और असंतोष का माहौल निर्मित हो गया है।

कमार समाज के अनुसार, अब तक वन विभाग की कार्रवाई के चलते लगभग 15 से 20 कमार जनजाति के लोगों को जेल भेजा गया है। आर्थिक रूप से कमजोर होने के कारण उनके परिवार जमानत तक कराने में असमर्थ हैं, जिससे संबंधित परिवारों को गंभीर आर्थिक और सामाजिक संकट का सामना कर रहे हैं। समाज का कहना है कि कमार जनजाति प्रदेश की विशेष पिछड़ी एवं संरक्षित जनजातियों में शामिल है, जिसकी आजीविका मुख्य रूप से जंगल और मजदूरी पर निर्भर है।
समाज के द्वारा मांग की गई है कि कथित फर्जी मामलों की उच्च स्तरीय एवं निष्पक्ष जांच कराई जाये तथा निर्दोष लोगों के खिलाफ दर्ज प्रकरणों को निरस्त किया जाये, साथ ही जेल में बंद आदिवासियों को कानूनी सहायता उपलब्ध कराने, दोषी पाये जाने वाले वन कर्मचारियों के खिलाफ विभागीय एवं कानूनी कार्रवाई करने तथा भविष्य में जनजातीय समुदाय के उत्पीड़न को रोकने के लिये आवश्यक निर्देश जारी करने की मांग भी की गई है।
राष्ट्रीय विशेष पिछड़ी जनजाति कमार समाज (भारत) के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनसिंग सोरी ने यह भी आरोप लगाया है कि वनाधिकार कानून के तहत व्यक्तिगत भूमि के अधिकार पत्र प्राप्त कर चुके कुछ परिवारों को उनकी जमीनों से हटाने का प्रयास किया जा रहा है, जिसकी शीघ्र जांच कराई जाये। इसके अलावा समाज ने कमार समुदाय के लिये रोजगार और आजीविका से जुड़ी सरकारी योजनाओं का लाभ सुनिश्चित करने तथा क्षेत्र में पर्याप्त रोजगार उपलब्ध कराने की मांग उठाई है।
ज्ञापन में चेतावनी दी गई है कि यदि मामले में शीघ्र कार्रवाई नहीं की गई तो कमार समुदाय जिला मुख्यालय में धरना प्रदर्शन एवं भूख हड़ताल करने के लिये बाध्य होगा। समाज ने उम्मीद जताई है कि शासन आदिवासी हितों और न्याय को ध्यान में रखते हुए इस गंभीर विषय पर त्वरित कार्रवाई करेगा।







