प्रार्थना की प्राथमिकता, शैक्षणिक गुणवत्ता दरकिनार : बच्चों के सिर पर टपकती छतें, मगर प्रार्थना शेड पर करोड़ों की कृपा ?

नवीन शिक्षण सत्र शुरू हो चुका है। बच्चे स्कूल पहुंच रहे हैं, लेकिन कई जगह स्कूल भवन खुद इस बात को लेकर असमंजस में दिखाई दे रहे हैं कि वे पूरा सत्र निकाल पायेंगे या नहीं..

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साजु चाको,बालोद। लगता है बालोद जिले में शिक्षा व्यवस्था के विकास का नया अध्याय लिखा जा रहा है। अब बच्चों को मजबूत कक्षाओं, सुरक्षित भवनों और साफ-सुथरे शौचालयों की जरूरत नहीं, क्योंकि उनके लिये सबसे बड़ी प्राथमिकता “प्रार्थना शेड” ठहराई गई है। जानकारी के अनुसार स्कूल में 6 करोड़ रुपये के प्रार्थना शेड का निर्माण कराया गया है। सवाल उठता है कि जब करीब 6 करोड़ रुपये प्रार्थना शेड पर खर्च किये जा सकते हैं, तो जर्जर स्कूल भवनों और बदहाल शौचालयों की चिंता करना क्या पुरानी सोच माना जाये ?

नवीन शिक्षण सत्र शुरू हो चुका है। बच्चे स्कूल पहुंच रहे हैं, लेकिन कई जगह स्कूल भवन खुद इस बात को लेकर असमंजस में दिखाई दे रहे हैं कि वे पूरा सत्र निकाल पायेंगे या नहीं।

पहेली सुलझाओ ..शौचालय में किसकी तस्वीर ?

कहीं दीवारों में दरारें हैं, कहीं छतें जवाब देने की तैयारी में हैं। बरसात आते ही बच्चे पढ़ाई से ज्यादा इस गणित में व्यस्त हो सकते हैं कि छत का कौन-सा हिस्सा पहले गिरेगा। उधर, शिक्षा विभाग और प्रशासन की प्राथमिकतायें भी कम दिलचस्प नहीं हैं। स्कूलों में शौचालयों की दुर्दशा, पेयजल की समस्या और कमरों की कमी जैसी छोटी-मोटी बातें शायद विकास के बड़े विजन में फिट नहीं बैठतीं। आखिर फोटो में चमकने वाला प्रार्थना शेड ज्यादा आकर्षक दिखाई देता है, जबकि जर्जर भवन और टूटे शौचालय, केवल समस्याओं का स्मरण कराते हैं।

ग्रामीणों और अभिभावकों का कहना है कि यदि करोड़ों रुपये उपलब्ध हैं तो सबसे पहले उन स्कूलों पर खर्च होना चाहिये, जहां बच्चे भय और असुविधा के बीच पढ़ाई करने को मजबूर हैं। लेकिन ऐसा लगता है कि अधिकारियों की नजर में बच्चों की सुरक्षा से ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि वे प्रार्थना किस छत के नीचे करें।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या जिले के जनप्रतिनिधियों को उन स्कूलों की हालत दिखाई नहीं देती जहां बरसात के दिनों में अभिभावक बच्चों को भेजने से डरते हैं? क्या शिक्षा विभाग ने कभी यह जानने की कोशिश की कि कितने स्कूलों में शौचालय उपयोग लायक हैं और कितने भवन मरम्मत की प्रतीक्षा में हैं?
व्यंग्य यह भी है कि यदि किसी जर्जर भवन की दीवार बोल पाती, तो शायद वह भी प्रशासन से यही कहती—”मुझे छोड़िए साहब, पहले प्रार्थना शेड बनाइए, क्योंकि बच्चों की सुरक्षा से ज्यादा जरूरी प्राथमिकताएं और भी हैं!”

अब जिले में चर्चा यही है कि विकास का पैमाना आखिर क्या है—बच्चों के लिये सुरक्षित कक्षायें,स्वच्छ शौचालय और मूलभूत सुविधाएं, या फिर ऐसे निर्माण कार्य जिनकी चमक कागजों और उद्घाटन समारोहों में ज्यादा नजर आती है ?

फिलहाल सवाल बरकरार है—क्या करोड़ों की योजनाओं के बीच बच्चों की सुरक्षा और शिक्षा की बुनियादी जरूरतें प्राथमिकता सूची में कहीं हैं भी, या फिर उन्हें अगली स्वीकृति का इंतजार करना होगा ?

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