करोड़ों की शासकीय राशि खर्च होने के बाद भी वितरण अधर में, कई जनपदों के गोदामों में हजारों टिफिन्स इंतजार में…
सीएम मनरेगा मजदूर टिफिन बॉक्स योजना – अधिकारियों के लिये टिफिन बम से कम नहीं
गरियाबंद । मनरेगा के जॉब कार्डधारी मजदूरों को सुविधा देने के उद्देश्य से वर्ष 2018 में खरीदे गये स्टील के टिफिन बॉक्स आठ साल बाद भी अपने वास्तविक हितग्राहियों तक नहीं पहुंच पाये हैं। प्रदेश के करीब 12 लाख मनरेगा मजदूरों के लिये शुरू की गई इस योजना के तहत बड़ी संख्या में तीन डिब्बे वाले स्टील टिफिन बॉक्स खरीदे गये थे। प्रदेश के विभिन्न विकासखंडों तक ट्रकों के माध्यम से सामग्री पहुंचाई भी गई, दो चार जनपद पंचायत द्वारा वितरित किया गया, लेकिन विधानसभा चुनाव की आचार संहिता लागू होने के बाद वितरण प्रक्रिया रुक गई।
इसके बाद सरकार बदली, पांच वर्ष तक कांग्रेस सरकार सत्ता में रही और अब भाजपा की विष्णुदेव साय सरकार का कार्यकाल भी चल रहा है, लेकिन कई स्थानों पर इन टिफिन बॉक्स को वितरीत किये जाने का इंतजार खत्म नहीं हुआ है।
बताया जा रहा है कि प्रदेश के अनेक जनपद पंचायतों में आज भी हजारों टिफिन बॉक्स गोदामों में रखे हुये हैं। कुछ स्थानों पर सरकारी भंडारण की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने के कारण सामग्री को किराये के गोदामों में रखने की स्थिति बनी हुई है। ऐसे में सवाल केवल टिफिन बॉक्स के वितरण का नहीं, बल्कि वर्षों से अनुपयोगी पड़ी शासकीय सामग्री पर होने वाले भंडारण व्यय और उसकी उपयोगिता का भी है।
ग्राम सुराज अभियान में हुई थी योजना की घोषणा
तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह ने 8 अप्रैल 2018 को ग्राम सुराज अभियान के दौरान अंबिकापुर में मुख्यमंत्री मनरेगा टिफिन बॉक्स योजना लागू करने की घोषणा की थी। योजना के तहत प्रदेश के लगभग 12 लाख मनरेगा जॉब कार्डधारी मजदूरों को टिफिन बॉक्स उपलब्ध कराने की तैयारी की गई थी।
इसके लिये नागपुर की वंदना इंटरप्राइजेज कंपनी को टेंडर दिये जाने की जानकारी सामने आई है। वर्ष 2018 में टिफिन बॉक्स की खरीदी के बाद प्रदेश के विभिन्न विकासखंडों में ट्रकों के माध्यम से बड़ी संख्या में सामग्री भेजी गई थी। कई जगह वितरण की तैयारियां भी की गईं, लेकिन इसी बीच विधानसभा चुनाव की आचार संहिता लागू होने और योजना को लेकर राजनीतिक विरोध के बाद वितरण प्रक्रिया रोक दी गई।
सरकार बदली, लेकिन नहीं बदला टिफिन बॉक्स का इंतजार
वर्ष 2018 के बाद प्रदेश में सत्ता परिवर्तन हुआ। कांग्रेस सरकार ने पांच वर्ष तक शासन किया,लेकिन इस अवधि में भी इन टिफिन बॉक्स के वितरण अथवा उनके संबंध में अंतिम निर्णय को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी।
इसके बाद भाजपा की विष्णुदेव साय सरकार सत्ता में आई। सरकार के कार्यकाल के लगभग तीन वर्ष बीतने के बावजूद प्रदेश के कई हिस्सों में टिफिन बॉक्स के वितरण का मामला लंबित बताया जा रहा है। जनपद पंचायत स्तर से उच्च कार्यालयों को इस संबंध में पत्राचार किये जाने की जानकारी भी सामने आ रही है।
गोदामों में बंद सामग्री, किराये का खर्च भी सवालों में
यदि वर्षों से हजारों टिफिन बॉक्स किराये के गोदामों में रखे हुये हैं, तो उनके भंडारण पर लगातार सरकारी राशि खर्च किये जाने का सवाल उठता है। जिस सामग्री को मनरेगा मजदूरों के उपयोग में आना था, वह वर्षों से गोदामों में बंद है और उसके रखरखाव के लिये अतिरिक्त खर्च भी हो रहा है।
लंबे समय तक अनुपयोगी पड़े रहने के कारण सामग्री की स्थिति और गुणवत्ता को लेकर भी सवाल उठना स्वाभाविक है। हालांकि वास्तविक स्थिति का पता भौतिक सत्यापन और संबंधित विभाग के अभिलेखों से ही चल सकेगा।
कितने खरीदे,कितना वितरण और कितने बचे—रिकॉर्ड सार्वजनिक हो
इस पूरे मामले में अब शासन स्तर पर स्पष्ट जानकारी सामने आने की जरूरत है। वर्ष 2018 में कुल कितने टिफिन बॉक्स खरीदे गये ? खरीदी पर कितनी शासकीय राशि खर्च हुई ? परिवहन में कितना भुगतान किया गया? प्रदेश के किन-किन विकासखंडों में कितनी संख्या में टिफिन बॉक्स भेजे गये ? कितने मजदूरों को उनका वितरण हुआ और वर्तमान में कितनी सामग्री गोदामों में मौजूद है?
इसके अलावा वर्षों से सामग्री के भंडारण पर कितना व्यय हुआ और वितरण नहीं किये जाने के लिये जिम्मेदारी किस स्तर पर तय की गई—इन सवालों के जवाब भी सार्वजनिक किये जाने की मांग उठ रही है।
वितरण होगा या नियमानुसार निस्तारण ?
सवाल ये है कि आठ वर्ष पुरानी इस सामग्री को लेकर शासन की आगे की योजना क्या है। यदि टिफिन बॉक्स अभी भी उपयोग योग्य हैं तो क्या इन्हें मनरेगा मजदूरों को वितरित किया जायेगा ? यदि सामग्री अनुपयोगी हो चुकी है तो क्या नियमानुसार नीलामी या अन्य प्रक्रिया के माध्यम से इसका निस्तारण किया जायेगा?
मनरेगा मजदूरों के लिये खरीदी गई सामग्री यदि वर्षों तक गोदामों में ही पड़ी रहती है तो यह केवल एक योजना के लंबित रहने का मामला नहीं है, बल्कि शासकीय खरीद के बाद सामग्री के उपयोग, भंडारण और संपत्ति प्रबंधन की पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है।
इस संबंध में त्रिस्तरीय पंचायत के विभिन्न जिम्मेदार अधिकारी कर्मचारियों का कहना है कि हमारी स्थिति सांप छूछूंदर की तरह है इसलिये हमारा नाम पद प्रकाशित न करें, जिला व प्रदेश की बैठकों में अनेकों बार टिफिन बाक्स का मामला उठा है प्रदेश के सचिव स्तर के अधिकारी मौन है।
