छुरा के श्री संकल्प छत्तीसगढ़ मिशन हॉस्पिटल पर कलेक्टर की कड़ी कार्रवाई की तैयारी : गंभीर लापरवाही के आरोपों पर अनुज्ञा निरस्तीकरण का नोटिस

जिले में कई निजी अस्पताल और क्लिनिक बिना पूर्ण संसाधनों और विशेषज्ञ डॉक्टरों के संचालित हो रहे हैं, लेकिन उन पर अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। ऐसे में “समान न्याय” की मांग जोर पकड़ रही है।

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दो अलग-अलग मामलों में जांच के बाद नोटिस जारी, जिले के अन्य निजी अस्पतालों / क्लीनिक्स पर समान कार्रवाई की मांग,

गरियाबंद। जिले के छुरा विकासखंड में संचालित श्री संकल्प छत्तीसगढ़ मिशन हॉस्पिटल एक बार फिर विवादों के केंद्र में है। मरीजों के इलाज में गंभीर लापरवाही और अनियमितताओं के आरोपों की वजह से कलेक्टर एवं जिला दंडाधिकारी गरियाबंद द्वारा अस्पताल प्रबंधन को अनुज्ञा पत्र (लाइसेंस) निरस्त करने से पूर्व दो अलग-अलग नोटिस जारी किये हैं। दोनों ही नोटिस 2 अप्रैल 2026 को जारी किये गये हैं, जिनमें अस्पताल की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किये गये हैं।

पहला मामला – इलाज में लापरवाही और अधूरे रिकॉर्ड

पहला नोटिस दिसंबर 2025 में प्रकाशित एक समाचार के आधार पर गठित जांच टीम की रिपोर्ट पर आधारित है। इस जांच में पाया गया कि मरीज के इलाज से जुड़े महत्वपूर्ण मेडिकल रिकॉर्ड अधूरे और विरोधाभासी हैं।
●जांच में सामने आया कि मरीज की स्थिति (G.C.और SpO2) में स्पष्ट विरोधाभास था।
● न्यूरोसर्जिकल ओपिनियन नहीं लिया गया
●सीटी स्कैन रिपोर्ट का स्रोत और समय दर्ज नहीं
●एनेस्थीसिया एवं प्री-एनेस्थीसिया रिकॉर्ड अधूरे
●ऑपरेशन से जुड़े दस्तावेज और एक्स-रे रिपोर्ट उपलब्ध नहीं, इन सभी बिंदुओं को गंभीर लापरवाही की श्रेणी में माना गया है।

दूसरा मामला – बिना अनुमति सर्जरी और मौत का विवाद

दूसरा नोटिस फरवरी 2026 में सामने आये एक चर्चित सर्जरी प्रकरण से जुड़ा है, जिसमें एक मरीज की मौत हो गई थी। जांच में यह तथ्य सामने आया कि –

●अस्पताल में 24 घंटे सर्जन उपलब्ध नहीं था।
●सर्जरी के लिये विभागीय अनुमति नहीं ली गई थी।
●आयुष्मान भारत योजना के तहत जनरल सर्जरी की अनुमति भी नहीं थी।
●मृत्यु की तारीख में डॉक्टर के बयान और दस्तावेजों में अंतर पाया गया।
●सहमति पत्र में तिथि और समय दर्ज नहीं था, हालांकि मरीज के परिजनों ने सीधे तौर पर अस्पताल पर आरोप नहीं लगाया, किन्तु प्रक्रियागत खामियां गंभीर पाई गईं।

30 दिनों में जवाब तलब

दोनों मामलों में अस्पताल प्रबंधन को 30 दिनों के भीतर अपना पक्ष प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया है। संतोषजनक जवाब नहीं मिलने पर अस्पताल का अनुज्ञा पत्र निरस्त किया जा सकता है।

समान कार्रवाई की उठी मांग

इस पूरे घटनाक्रम के बाद जिले के अन्य निजी अस्पतालों / क्लीनिक्स को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि यदि छुरा के अस्पताल पर इतनी कड़ी कार्रवाई की जा रही है, तो अन्य निजी अस्पतालों तथा जिला मुख्यालय में संचालित सभी क्लीनिक्स और पैथॉलाजी लैब जैसी स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में संचालित सभी संस्थानों की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिये।

आरोप है कि जिले में कई निजी अस्पताल और क्लिनिक बिना पूर्ण संसाधनों और विशेषज्ञ डॉक्टरों के संचालित हो रहे हैं, लेकिन उन पर अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। ऐसे में “समान न्याय” की मांग जोर पकड़ रही है।

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