भ्रष्टाचार का कुआं खोद रही जेसीबी मशीन
गरियाबंद । जिले की एक ग्राम पंचायत मदांगमुंडा में नरेगा के तहत कुआं नहीं, बल्कि व्यवस्था की नीयत खोदी गई,वो भी जेसीबी से । मिली जानकारी के अनुसार धनशाय और घासीराम के नाम पर मनरेगा के तहत ₹2,80,000 का सरकारी कुआं स्वीकृत हुआ था— ताकि गांव के बेरोजगार ग्रामीणों को अपने ही गांव में रोज़गार मिल सकें। लेकिन मैदान में न फावड़ा दिखा, न घमेला। मैदान में उतरी गर्जना करती जेसीबी मशीन।
फावड़ा-घमेला लाइन में, जेसीबी मैदान में , यही है पंचायत का ‘विकास मॉडल’ – जिन हाथों को काम मिलना था, वे हाथ आज भी खाली हैं। जिन युवाओं को मिट्टी से रोज़ी निकालनी थी,वे आज किनारे खड़े तमाशा देख रहे है, बीच मैदान में जेसीबी मशीन ऐसे दहाड़ रही है,जैसे हर वार के साथ बेरोजगारों के मुंह पर सशक्त तमाचा जड़ रही हो।

काम मजदूरों का,शोर मशीन का, और बिल नरेगा का..
प्रसिद्ध अर्थशास्त्री और सामाजिक कार्यकर्ता ज्यां द्रेज ने जब भारत में नरेगा की परिकल्पना की, तब उन्होंने सोचा भी नही होगा कि भारत में मुझसे भी अधिक जीनियस है।
ऐसे जीनियस जिन्होंने लूटमारी/डकैती में चम्बल के डाकुओं को भी पीछे छोड़ दिया है। ईन्ही जीनियस के चेले चंटों ने ग्राम मदांगमुंडा में नियमों को जेसीबी के ट्रैक के नीचे रौंद दिया। यहां धनशाय-घासीराम के नाम पर कुंआ खोदा जाना था, मनरेगा नियमों के तहत, किन्तु चला ‘मशीन राज’।
पहले मशीन से कुआं खोदो,
फिर रजिस्टर में मजदूरों के नाम भरो,और अंत में सीना ठोककर कह दो—
“सब नरेगा से हुआ है।”
यहां सवाल ये नहीं कि कुआं बना या नहीं,
सवाल ये है—कैसे बना?
आपको बता दें कि ” मनरेगा,अर्थात ‘महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा/MGNREGA) भारत सरकार द्वारा ग्रामीण आबादी को आजीविका सुरक्षा प्रदान करने वाली एक प्रमुख योजना रही है। 7 सितंबर 2005 को अधिनियमित, इस योजना में, ग्रामीण परिवारों को एक वित्तीय वर्ष में कम से कम 100 दिनों के गारंटीकृत अकुशल शारीरिक रोज़गार का कानूनी अधिकार मिला था।
किन्तु ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करती, योजनारूपी- ग्राम्य विकास की ये दीवार कुछ निहित भ्र्रष्टाचारियों के लूटलक्ष्य के बीच रोड़ा बन गई।
आश्चर्य तो तब है कि जब ग्राम विकास की इस योजना में सत्तारूढ़ बीजेपी सरकार को भी अपना ‘राष्ट्रीय विजन, दिखाई दे रहा है,और इसका नाम व स्वरूप बदला गया है।
इधर सिस्टम का भी एक आईना है – जो बताता है,मदांगमुंडा का कुआं सिर्फ मिट्टी की खुदाई का नहीं,यह उस सिस्टम की तस्वीर है
जहां ₹2,80,000 स्वीकृत होते हैं, लेकिन रोजगार शून्य रहता है।
आप जान लीजिये..जब तक जेसीबी फावड़े की जगह लेती रहेगी,जब तक फाइलें सच्चाई ढकती रहेंगी, तब तक नरेगा का मतलब रहेगा—
काम कागजों में,और बेरोजगारी जमीन पर। सिस्टम अगर नहीं बदला,तो एक दिन जनता फावड़ा उठाकर जरूर सवाल खोद लेगी और पूछेगी रामराज कब आयेगा ?







