मंडल आयोग के बाद शायद यह पहली बार है जब सामान्य वर्ग की सामूहिक बेचैनी देश की राजधानी दिल्ली की सड़कों पर दिखाई दे रही है। इसे केवल UGC के विरोध का आंदोलन समझना भूल होगी। यह उस व्यवस्था के खिलाफ जमा हुआ आक्रोश है, जिसमें सामान्य वर्ग के अधिकारों की कीमत पर लगातार राजनैतिक समीकरण साधे गये।
इस भीड़ का सवाल बड़ा सीधा है सत्ता में बैठे हुक्मरानों से, क्या सामान्य वर्ग का नागरिक इस देश का बराबर का नागरिक है या केवल टैक्स देने, व्यवस्था चलाने और चुनाव के समय संख्या संसाधन पूरी करने वाला वर्ग ?
सामाजिक न्याय के नाम पर जिन वर्गों को अवसर देने की बात हुई, वह अपने स्थान पर उचित बहस का विषय हो सकती है। लेकिन सवाल यह है कि न्याय के नाम पर एक वर्ग के अधिकारों को लगातार क्यों काटा जाये ?
किसी गरीब बच्चे ने दिन-रात मेहनत की। किसी सामान्य वर्ग के परिवार ने अपनी हैसियत से अधिक खर्च करके उसे पढ़ाया। उसने परीक्षा में सफलता हासिल की,लेकिन व्यवस्था ने उससे कहा तुम्हारी मेहनत पर्याप्त नहीं है, तुम्हारी योग्यता की कोई वैल्यू नहीं है पहले यह बताओ कि तुम किस जाति में पैदा हुये हो ?
यह केवल एक बच्चे के अवसर का सवाल नहीं है। यह उसकी मेहनत, उसके माता-पिता के सपनों और उसके भविष्य के साथ किया गया सरासर अन्याय है और सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि सामान्य वर्ग के हितों की बात करना आज राजनीतिक रूप से असुविधाजनक बना दिया गया है। इस वर्ग के लिये बोलने वाला तुरंत सामंती, विशेषाधिकारवादी या जातिवादी घोषित कर दिया जाता है।
हाँ, सामान्य वर्ग में सामंती मानसिकता वाले लोग हैं लेकिन सामंतवाद किसी जाति की जागीर नहीं है। हर समाज में शोषक भी होते हैं और पीड़ित भी अपराधी की पहचान अपराध से होनी चाहिये, जाति से नहीं।
लेकिन वोट-बैंक की राजनीति ने इस सरल सत्य को उलट दिया है। राजनीतिक दलों को वह वर्ग दिखाई देता है जिससे वोट मिलते हैं वह वर्ग दिखाई नहीं देता जिसकी शिकायत राजनीतिक रूप से लाभदायक नहीं है।
यही कारण है कि सामान्य वर्ग के अधिकारों को लेकर व्यवस्था में एक अजीब-सी प्राथमिक हीनता दिखाई देती है उससे अपेक्षा की जाती है कि वह हर अन्याय को सामाजिक न्याय के नाम पर स्वीकार करे, लेकिन जब उसके साथ अन्याय हो तो उसे बोलने तक का नैतिक अधिकार न दिया जाये।
यह लोकतंत्र नहीं हो सकता कि अधिकार मांगने वाला हमेशा दोषी हो और अधिकार बांटने वाला हमेशा न्यायप्रिय सामाजिक न्याय का अर्थ यह नहीं हो सकता कि एक अन्याय को समाप्त करने के नाम पर दूसरा अन्याय स्थायी कर दिया जाये।
आज दिल्ली से उठती यह आवाज इसलिये महत्वपूर्ण है क्योंकि यह पूछ रही है आखिर सामान्य वर्ग के अधिकारों की भी कोई कीमत है या नहीं ?
उसकी प्रतिभा की भी कोई प्राथमिकता है या नहीं ?
उसके बच्चों के भविष्य का भी कोई अधिकार है या नहीं ?
और सबसे बड़ा सवाल क्या इस लोकतंत्र में सामान्य वर्ग को केवल इसलिये चुप रहना होगा क्योंकि उसकी पीड़ा से कोई वोट-बैंक नहीं बनता ?
अब सवाल केवल आरक्षण , यूजीसी का नहीं है।
सवाल है क्या इस देश की व्यवस्था सामान्य वर्ग को भी बराबरी का नागरिक मानेगी या नहीं ?
शुभेन्द्र शुक्ला की Facebook Wall से साभार
There is no ads to display, Please add some
