जहां अदालती आदेश उपेक्षित, वहां आम आदमी की क्या बिसात ?

सरकार की शक्ति उसके आदेशों में नहीं, बल्कि उन आदेशों के प्रति जनता के विश्वास में निहित होती है।

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विशेष संपादकीय। किरीट ठक्कर

न्यायालय का आदेश किसी कार्यालय की फाइल में रखे जाने वाला महज एक कागज नहीं होता। वह शासन-व्यवस्था की उस संवैधानिक जिम्मेदारी की याद दिलाता है, जिसके सामने पद, विभाग और प्रशासनिक सुविधा गौण हो जाते हैं। लेकिन जब किसी सरकारी विभाग को ही अपने विरुद्ध जारी अदालती आदेश की अनुपालना के लिये कुर्की वारंट तक की स्थिति का सामना करना पड़े, तो सवाल केवल एक मामले का नहीं रह जाता, सवाल पूरी प्रशासनिक व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर खड़ा होता है।

गरियाबंद में सहायक आयुक्त, आदिवासी विकास विभाग के कार्यालय की चल संपत्ति की कुर्की के लिये 11 अगस्त को जारी वारंट इसी गंभीर सवाल को सामने लाता है। अतिरिक्त मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण, गरियाबंद के आदेश में डिक्री की राशि ब्याज और वाद व्यय सहित लगभग 13 लाख 14 हजार रुपये बताई गई है।

मामला कोई अचानक पैदा हुई परिस्थिति का नहीं है। करीब दो वर्ष पहले, 9 अगस्त 2024 को अधिकरण ने अधिनिर्णय पारित कर आवेदकों को क्षतिपूर्ति राशि अदा करने का आदेश दिया था। इसके बावजूद भुगतान और आदेश की अनुपालना उस स्थिति तक पहुंच गई, जहां सरकारी कार्यालय की चल संपत्ति की कुर्की के लिये वारंट जारी करना पड़ा।

यह स्थिति प्रशासनिक दक्षता और पारदर्शिता के उन दावों पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती है, जिन्हें सरकारी बैठकों और आदेशों में बार-बार दोहराया जाता है।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब एक सरकारी विभाग अदालती आदेश की समय पर अनुपालना नहीं करता, तब एक सामान्य नागरिक अपने आवेदन, शिकायत या अधिकार की सुनवाई की कितनी उम्मीद रख सकता है ?

आम आदमी अदालत इसलिये जाता है कि उसे व्यवस्था में न्याय की उम्मीद दिखाई देती है। वह वर्षों तक तारीखें भुगतता है, वकीलों की फीस देता है और अंततः जब न्यायालय उसके पक्ष में आदेश देता है, तब उसकी उम्मीद होती है कि शासन और प्रशासन के द्वारा उस आदेश का ससम्मान पालन किया जायेगा। किन्तु जब न्यायालय के आदेश के बाद भी उसे अपने अधिकार की प्राप्ति के लिये अगली कानूनी कार्रवाई का सहारा लेना पड़े, तो यह केवल उस व्यक्ति की परेशानी नहीं, बल्कि न्यायिक व्यवस्था और प्रशासनिक तंत्र के बीच समन्वय की विफलता है।

और यहां मामला किसी निजी संस्था का नहीं है। यह वही विभाग है जिस पर आदिवासी समुदाय के विकास, उनके हितों की रक्षा और कल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। जिस विभाग से दूरस्थ और वंचित तबकों को संवेदनशील प्रशासन की उम्मीद होती है, यदि उसी विभाग की अपनी कार्यप्रणाली न्यायालयीन आदेशों की अवहेलना के सवालों के घेरे में आ जाये, तो स्वाभाविक रूप से व्यवस्था की संवेदनशीलता पर सवाल उठेंगे।

विडंबना यह भी है कि प्रशासनिक व्यवस्था में प्रत्येक सप्ताह समय-सीमा की बैठकें होती हैं। लंबित मामलों की समीक्षा होती है। अधिकारियों को कार्यों की प्रगति बतानी होती है। फिर यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि न्यायालय द्वारा लगभग दो वर्ष पहले दिये गये आदेश की जानकारी और उसकी अनुपालना की स्थिति इन बैठकों में कभी समीक्षा का विषय क्यों नहीं बनी ?

क्या समय-सीमा की बैठकें वास्तव में लंबित मामलों को उनके तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाने का माध्यम हैं, या फिर वे भी धीरे-धीरे एक नियमित औपचारिकता बनती जा रही हैं ?

ये सवाल इसलिये भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले कुछ समय में आदिवासी विकास विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर विभिन्न प्रकार के आरोप और शिकायतें सामने आती रही हैं। स्कूलों में शौचालय निर्माण जैसे बुनियादी विषयों पर सवाल उठे हैं। नौकरी लगाने के नाम पर रकम मांगने संबंधी शिकायतें लेकर लोग अधिकारियों के कार्यालयों के चक्कर काटते दिखाई देते हैं। और अब न्यायालयीन मामले में आदेश की अनुपालना न होने के कारण सरकारी संपत्ति की कुर्की की नौबत सामने है।

इन सभी घटनाओं को एक-दूसरे से जोड़कर किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा। लेकिन इतना अवश्य पूछा जाना चाहिये, कि आखिर शिकायतों और सवालों की यह श्रृंखला विभागीय जवाबदेही के स्तर पर क्या संकेत देती है ?

सबसे चिंताजनक स्थिति तब होती है जब न्यायालयीन प्रक्रिया के दौरान किसी वरिष्ठ अधिकारी की ओर से वारंट या नोटिस की तामीली जैसे मूलभूत न्यायिक प्रक्रिया के प्रश्नों पर ही सवाल खड़े किये जाये । सरकारी अधिकारी के पास अपने पक्ष को न्यायालय के समक्ष रखने के सभी वैधानिक अधिकार हैं, लेकिन न्यायालयीन प्रक्रिया के प्रति सम्मान और आदेशों की अनुपालना किसी भी प्रशासनिक पद की बुनियादी जिम्मेदारी होनी चाहिये।

सरकार की शक्ति उसके आदेशों में नहीं, बल्कि उन आदेशों के प्रति जनता के विश्वास में निहित होती है।

यदि किसी गरीब, आदिवासी, किसान, श्रमिक या सामान्य नागरिक को अपने अधिकार के लिये अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़े और न्यायालय उसके पक्ष में आदेश दे, फिर भी उसे आदेश लागू करवाने के लिये वर्षों तक संघर्ष करना पड़े, तो कानून की पहुंच उसके लिये अधूरी रह जाती है।

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